लेखक: अयाज़ अमीर
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | अमेरिकियों ने भी मध्य पूर्व में कैसी स्थिति पैदा कर दी है। अपना तो नुकसान किया ही, लेकिन अपने अरब सहयोगियों को भी कहीं का नहीं छोड़ा। सबसे बड़ा सहयोगी सऊदी अरब था और उसके साथ एक तरह का समझौता 1945 में हुआ था, जो राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट और सऊदी अरब के शासक शाह अब्दुलअज़ीज़ के बीच हुआ था। याल्टा सम्मेलन के बाद स्वेज़ नहर के पास एक अमेरिकी युद्धपोत पर यह ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति की नज़र सऊदी तेल पर थी, जबकि सऊदी शासक को अमेरिकी सुरक्षा की आवश्यकता थी। यानी एक तरफ तेल और दूसरी तरफ सुरक्षा की गारंटी। उस समय से लेकर अब तक अमेरिका और सऊदी अरब के संबंधों की बुनियाद यही अनौपचारिक समझौता रहा है। अमेरिका की कार्रवाई का परिणाम यह हुआ है कि ईरान पर हमला करके उसने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि यह आपसी समझ हवा में घुल गई है। यमन में हूतियों की बढ़त के बाद सऊदी अरब पर यह बात स्पष्ट हो गई है कि मुश्किल समय में अमेरिकी वादों का कोई मतलब नहीं रह जाता।
अंसारुल्लाह या हूतियों की बढ़त शुरू हुई और सऊदी अरब के समर्थक पीछे हटने लगे तो पिछले गुरुवार को सऊदी युवराज ने दो बार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन करके मदद की अपील की, लेकिन आगे से उन्हें टालमटोल वाला जवाब मिला। सऊदी युवराज पर क्या गुज़री होगी? जब पिछले साल राष्ट्रपति ट्रंप ने क़तर, यूएई और सऊदी अरब का दौरा किया था, तो क्या कुछ अरब नेताओं ने उन पर अपनी पूरी उम्मीदें नहीं लगा दी थीं? इन नेताओं को राष्ट्रपति ट्रंप से कितनी उम्मीदें थीं। और अब जिसे वे अपना रक्षक और हितैषी समझ रहे थे, उसी ने उनके लिए तबाही की स्थिति पैदा कर दी है। ये सभी नेता अब क्या सोच रहे होंगे?
सऊदी अरब के लिए यह स्थिति बिल्कुल नई है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद है और वहां से सऊदी तेल बाहर नहीं जा रहा है। इसके विकल्प के तौर पर सऊदियों ने देश के दूसरी ओर यनबू बंदरगाह तक एक रास्ता बनाया था। इसके लिए एक बड़ी पाइपलाइन बिछाई गई है, जिसे ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन कहा जाता है। इस पाइपलाइन पर हमले हुए हैं, जिससे पूरी आपूर्ति बंद हो गई है। पहले कहा जा रहा था कि इसकी मरम्मत में कुछ दिन लगेंगे, लेकिन अब मामला उससे कहीं आगे बढ़ गया है। पिछले 30 वर्षों में सऊदी तेल का निर्यात सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है और वैश्विक कीमतें बढ़ गई हैं। अमेरिका ने इस युद्ध के दौरान ईरान पर हजारों हमले किए हैं। सऊदी अरब के मुश्किल समय में उसके लिए भी कुछ हमले कर देते। लेकिन व्हाइट हाउस ने लगभग साफ तौर पर इनकार कर दिया और कहा कि आपके पास पर्याप्त हथियार हैं, आपको खुद कुछ करना चाहिए।
जहां तक सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए त्रिपक्षीय रक्षा समझौते का सवाल है, अगर पर्दे के पीछे कोई बातचीत चल रही है तो उसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है, जिससे यह पता चल सके कि त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के तहत अंसारुल्लाह की बढ़त को लेकर कोई विचार-विमर्श हुआ है या नहीं।
इतनी बात लोगों को समझ में आ रही है कि इस समस्या का कोई सैन्य समाधान नहीं है। उत्तरी यमन, जो अंसारुल्लाह का गढ़ है, पहाड़ी इलाकों पर आधारित है और वहां किसी बाहरी सैन्य शक्ति का उतरना आसान नहीं है। मिस्र के जमाल अब्दुल नासिर ने 1962 में उत्तरी यमन में मिस्र की सेना भेजी थी, जिसमें मिस्र की सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा था।
यह सऊदी समर्थित यमनी सरकार की बहुत बड़ी गलती थी कि उसने जुलाई में सना हवाई अड्डे पर उस समय हमला कर दिया, जब अंसारुल्लाह का एक प्रतिनिधिमंडल आयतुल्लाह ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होकर सना लौट रहा था। मौजूदा लड़ाई की शुरुआत वहीं से हुई।
वैसे भी अमेरिका अतीत में अंसारुल्लाह पर हवाई हमले करके देख चुका है। दो महीने की बमबारी में अमेरिका के एक अरब डॉलर के हथियार इस्तेमाल हो गए, लेकिन अंसारुल्लाह को कोई खास नुकसान नहीं हुआ। इससे पहले सऊदी अरब और यूएई ने भी यमन पर हमला किया था, लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। अब जो स्थिति है, वह पूरी दुनिया के सामने है।
सऊदी अरब की पूरी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है और उसकी आपूर्ति दोनों तरफ से बंद हो गई है। सऊदी अरब की नज़र में सबसे बड़ा दुश्मन ईरान था। दिवंगत शाह अब्दुल्लाह ने राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से कहा था कि अगर सांप को मारना हो तो उसके सिर पर वार करना चाहिए। उनका इशारा ईरान की ओर था। लेकिन आज जो विनाशकारी स्थिति पैदा हुई है, वह ईरान की वजह से नहीं बल्कि अमेरिका के कारण बनी है।
इस मामले का समाधान यह है कि अमेरिका को एक तरफ रखकर सऊदी अरब और ईरान के बीच कोई समझौता हो। लेकिन सऊदी अरब की अमेरिका पर लंबे समय से चली आ रही निर्भरता को समाप्त करना सऊदी नेतृत्व के लिए इतना आसान नहीं होगा। ऐसी निर्भरता धीरे-धीरे मनोवैज्ञानिक आवश्यकता बन जाती है और उससे बाहर निकलना आसान नहीं होता।
लेकिन समाधान यही है। सऊदी अरब में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे वैसे भी ईरानी मिसाइलों के कारण निष्क्रिय हो चुके हैं। वहां तैनात अमेरिकी सैनिक कहीं होटलों में रहने लगे हैं। जहां तक अमेरिकी लड़ाकू विमानों का सवाल है, वे सऊदी अरब के किसी काम नहीं आए। सऊदी अरब का तेल वैश्विक तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का कारण बनता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि तेल की आपूर्ति ही बंद है। अमेरिकी समझौते से सऊदी अरब को और क्या हासिल करना था?
लेकिन फिर वही बात है कि पुरानी आदत से छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इस मोड़ पर अमेरिका का रवैया भी देखा जाए। सऊदी अरब मुश्किल में फंसा हुआ है और अमेरिकी ऐसे व्यवहार कर रहे हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं। वे बड़े आराम से कह रहे हैं कि हूतियों से हमारे संपर्क बने हुए हैं और उनका कहना है कि यह रोक केवल सऊदी जहाजों पर लागू है। राष्ट्रपति ट्रंप के अनुसार, वे इस मामले को सीधे तौर पर सुलझा लेंगे।
अंग्रेज़ी में एक मुहावरा है—किसी को बस के नीचे फेंक देना। इस समय जो विश्लेषण सामने आ रहे हैं, उनमें यह बात भी कही जा रही है कि अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपने सबसे पुराने सहयोगी के साथ यही व्यवहार किया है।
अपनी तमाम कमजोरियों के कारण मुस्लिम दुनिया ने खुद को कितना नुकसान पहुंचाया है। इराक पर हमला हुआ, सब चुप बैठे रहे। कुछ करना तो दूर की बात है, विरोध में एक आवाज़ भी नहीं उठी। लीबिया को तबाह करने की तैयारी की गई, मुस्लिम देश चुप रहे। पश्चिमी शक्तियों ने सीरिया में अशांति शुरू की, मुस्लिम देश चुप रहे। ग़ज़ा में जो कुछ हुआ, वह कल की ही बात है और विरोध में मुस्लिम देश एक उंगली तक नहीं उठा सके। पिछले साल ईरान पर पहला हमला हुआ, तब भी सब चुप रहे। इस साल फरवरी में ईरान पर युद्ध थोपा गया, तब भी सभी नेताओं ने चुप्पी साधे रखी।
खाड़ी देशों ने निंदा करना तो दूर, इन सभी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए किया गया। आज ये सभी देश असहाय होकर हाथ पर हाथ रखे हालात को देख रहे हैं। इन सभी की अर्थव्यवस्था तेल और गैस पर निर्भर है, जिसकी आपूर्ति इस युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हुई है।
इतिहासकार इन घटनाओं के बारे में क्या फैसला देंगे? क्या वे यह कहेंगे कि इज़राइल और अमेरिका अपने कथित उद्देश्यों के साथ ईरान पर चढ़ आए और व्यावहारिक रूप से मुस्लिम दुनिया तमाशबीन बनी रही। कुछ न कर पाने की स्थिति में कम से कम इतनी हिम्मत तो होती कि हमारी धरती पर मौजूद सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ न किया जाए। अगर इतना भी कहा जाता तो आज स्थिति अलग होती। लेकिन इसके लिए रीढ़ की हड्डी चाहिए। अगर वह न हो तो दुनिया का सारा तेल भी किस काम का?
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